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NEET 2025-26 कट-ऑफ का गिरना: चिकित्सा शिक्षा के लिए चेतावनी

NEET 2025-26 कट-ऑफ का गिरना: चिकित्सा शिक्षा के लिए चेतावनी

NEET 2025-26 कट-ऑफ का गिरना: चिकित्सा शिक्षा के लिए चेतावनी

NEET कट-ऑफ का – 40 तक गिरना (माइनस में) केवल एक परीक्षा-सम्बंधी खबर नहीं है, बल्कि यह भारतीय चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े एक गहरे संकट की ओर संकेत करता है। इसे मात्र “अंक- प्रणाली में बदलाव” मानकर नजरअंदाज करना गंभीर भूल होगी। यह विषय सीधे-सीधे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और समाज के भरोसे से जुड़ा है।

यह स्वीकार करना होगा कि देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में चिकित्सकीय सेवाओं की कमी एक वास्तविक चुनौती है। परंतु इस समस्या का समाधान यदि प्रवेश स्तर पर मानकों को कमजोर करके खोजा जाएगा, तो इसके दूरगामी परिणाम देश को वर्षों तक भुगतने पड़ सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ निर्णय की छोटी-सी चूक भी किसी जीवन को जोखिम में डाल सकती है। इसलिए चिकित्सा में प्रवेश के लिए न्यूनतम योग्यता और बौद्धिक क्षमता का स्पष्ट मानदंड होना अनिवार्य है।

चिकित्सा शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने या परीक्षा पास करने का नाम नहीं है। यह एक ऐसा अनुशासन है जिसमें वैज्ञानिक समझ, क्लिनिकल तर्क, नैतिक विवेक, संवाद कौशल और उत्तरदायित्व की निरंतर परीक्षा होती है। यदि शुरुआत में ही चयन प्रक्रिया कमजोर होगी, तो आगे चलकर वही कमजोरी उपचार की गुणवत्ता, गलत निदान, अनावश्यक दवाओं, और मरीज की सुरक्षा पर असर डाल सकती है। परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और डॉक्टर–मरीज संबंध में विश्वास कमजोर होगा।

यह भी समझना जरूरी है कि भारत को केवल “अधिक डॉक्टर” नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे डॉक्टर चाहिए जो क्लिनिकली सक्षम, व्यावहारिक रूप से प्रशिक्षित, और वास्तविक परिस्थितियों में सुरक्षित निर्णय लेने में समर्थ हों। मेडिकल सीटें बढ़ाना तभी सार्थक है जब उसके साथ-साथ शिक्षकों की संख्या, प्रशिक्षण अस्पतालों की क्षमता, लैब व उपकरण, सिमुलेशन ट्रेनिंग, और कठोर मूल्यांकन प्रणाली को भी उसी अनुपात में मजबूत किया जाए। अन्यथा हम ऐसे स्नातक तैयार कर देंगे जिनके पास डिग्री तो होगी, पर मरीज के सामने खड़े होकर जिम्मेदारी निभाने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास और कौशल अधूरा होगा।

समाधान स्पष्ट है — योग्यता की सीमा घटाना सुधार नहीं, शॉर्टकट है। वास्तविक सुधार प्रशिक्षण की गुणवत्ता में निवेश से आएगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम अनिवार्य हैं:

  1. निष्पक्ष और सख्त प्रवेश मानदंड, जो न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित करें
  2. कौशल-आधारित चिकित्सा शिक्षा, जिसमें पर्याप्त बेडसाइड ट्रेनिंग और वास्तविक केस-एक्सपोज़र हो
  3. वरिष्ठ चिकित्सकों की प्रभावी निगरानी व मेंटरशिप, ताकि सीख सुरक्षित और मानकीकृत हो
  4. मेडिकल कॉलेजों का नियमित निरीक्षण व ऑडिट, जिसमें शिक्षण स्तर, फैकल्टी स्ट्रेंथ और क्लिनिकल ट्रेनिंग की वास्तविक जांच हो

आज आवश्यकता “क्वांटिटी बनाम क्वालिटी” की बहस की नहीं है, बल्कि दोनों के संतुलित और जिम्मेदार विकास की है। क्योंकि आज अगर नींव कमजोर होगी, तो कल उसकी कीमत देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और आम नागरिक को चुकानी पड़ेगी। चिकित्सा शिक्षा में लिया गया हर निर्णय अंततः मरीज तक पहुंचता है—और यही इस विषय की सबसे बड़ी गंभीरता है।

अंत में प्रश्न केवल नीति का नहीं, नैतिकता का भी है — क्या हम ऐसे डॉक्टर तैयार कर रहे हैं, जिनसे हम स्वयं अपना इलाज करवाना भी पसंद नहीं करेंगे?

डॉ. मनोज अग्रवाला
एम.डी. त्वचा रोग (डर्मेटोलॉजी)
(सीएमसी वेल्लोर)